दानिश को ख़ुद चुभने लगी हैं, लाउडस्पीकरों से पांच बार आती वो आवाज़ें,
जो अब घंटियों के साथ आती आवाज़ों से टकरा रही हैं. कुछ अभियानों में
स्वच्छ भारत बनाने की अच्छी कोशिशें हो रही हैं.
लेकिन उसी वक़्त में कहीं चलते दूसरे अभियानों ने स्वच्छ हुई सड़कों पर किसी एक मज़हब का ख़ून गिराकर चोट पहुंचाई है.
अभियान ही अभियानों की काट कर रहे हैं, लेकिन इन अभियानों के जुटान में दिख रही मुंडियां किसकी हैं? हमारे आपके घरों की.
'क्या ये सवाल मैं खड़ा कर रहा हूं. नहीं, ये सवाल ख़ुद-ब-ख़ुद अपने पैरों पर ख़ुद खड़े हैं.'
मुल्क के कुछ सीन व्हाट्सएप, फ़ेसबुक पर आए इंस्पायरिंग मेसेज लगते हैं. जिन्हें हम डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर शेयर करने में देर नहीं लगाते हैं.
जैसे बुर्का पहने औरत का किसी नन्हें कान्हा को गोद में ले जाना. या कांवड़ियां को सफ़ेद टोपी वाले का पानी पिलाना. पर ये सब अब स्क्रीन पर ही देखने की आदत ज़्यादा हो गई है.
असल ज़िंदगी में मुल्क के अलग-अलग टुकड़ों पर अंकित सक्सेना और रकबर जैसों की लाशें उगी आ रही हैं. ऐसे में जब आरती मोहम्मद मुराद अली के माथे पर तिलक लगाती है या मुराद अली मंदिर के पास बैठकर चाय पीता है तो लगता है कि फ़ोन पर एक इंस्पायरिंग मेसेज आया है. नाचना गाना तो ठीक है, लेकिन हम खाना नहीं खाते हैं इन लोगों का.'' इन लोग यानी हिंदू, मुस्लिम, शिया, सुन्नी, ब्राह्मण, दलित, ठाकुर.
कुछ अपवाद हैं, जैसे कलाम, अब्दुल हामिद. मुल्क फ़िल्म में जज (कुमुद मिश्रा )कहता है कि अपवाद सिर्फ़ ये नहीं कई और हैं.
लेकिन उन कई और के बारे में पढ़ने की फुर्सत न तो संतोष आनंद (आशुतोष राणा) जैसों को है न उन लाखों लोगों को, जो 'देखते ही शेयर करें' माहौल में पल बढ़ रहे हैं.
या ये कहें कि हम सब 'सत्य ज़्यादा आवश्यक है या न्याय' की लड़ाई में उलझे हुए लोग हैं. यक़ीनन सत्य और न्याय की परिभाषाएं भी हमने वैसे ही बुनी हैं, जैसे कुछ लोगों ने जेहाद की और कुछ ने अखंड भारत की. इंग्लिश में बोलें तो 'रिलिजियस तुकबंदी'
ऐसी ही धार्मिक तुकबंदी का शिकार भारत, पाकिस्तान, अमरीका, सीरिया और म्यांमार जैसे मुल्कों में कितने ही बिलाल (मनोज पाह्वा) हुए जा रहे हैं.
ग़लती इतनी कि वो बाप थे. एक आतंकी के बाप. जांच भी ज़रूरी, दोषियों को सज़ा भी और निर्दोष का बाइज्ज़त बरी होना भी. हीं ज़रूरी है तो उस टोपी को देखना जो बिलाल के सिर पर थी. एक बार सोचिएगा, दुनिया साफ़ देखने के लिए हमें आपको चश्मा साफ़ करने की ज़रूरत नहीं है?
डिलाइट सिनेमा से फ़िल्म देखकर बाहर आए सुधीर कुमार आर्या मुल्क देखकर भावुक हो गए थे. कहने लगे, ''जी भरा हुआ है मेरा. कुछ नेता हमको लड़वा रहे हैं. मेरे कुछ दोस्त मुसलमान हैं, वो मुझसे भी अच्छे हैं. सब लोग देखें कि न कोई मुसलमान है न कोई हिंदू हैं. पहले हम हैं.''
मुल्क में दो तरह के जज हैं. एक मुल्क फ़िल्म वाला जज, जो कहता है, 'संविधान के पहले पन्ने की कॉपी का प्रिंट करवाकर रखो.
कोई हम और वो की बात करें तो ऐसे लोगों के मुंह पर संविधान का पहला पन्ना मार दीजिए. या जब भी कभी ये हो रहा है तो जाकर कैलेंडर देखिए कि चुनाव में कितना वक़्त है.' एक पर्दे से बाहर वाले जज, जिनमें से कुछ की परिभाषाएं धर्म से होकर गुज़रती हैं.
मुल्क फ़िल्म वाले जज की बात न मानने पर आप, हम भी उस धार्मिक राजनीति का शिकार होते रहेंगे, जो 'कपोल कल्पनाओं' यानी प्रिज़म्पसन पर आधारित है.
कपोल कल्पनाएं, जो आपको हमें धीरे-धीरे भयाक्रांत करती रहेंगी और हम इससे बचने के लिए अपने-अपने घरों की छत पर लगे स्पीकरों से बस अरबी-हिंदी में यही कहते रह जाएंगे- धर्म की जय हो...
लेकिन उसी वक़्त में कहीं चलते दूसरे अभियानों ने स्वच्छ हुई सड़कों पर किसी एक मज़हब का ख़ून गिराकर चोट पहुंचाई है.
अभियान ही अभियानों की काट कर रहे हैं, लेकिन इन अभियानों के जुटान में दिख रही मुंडियां किसकी हैं? हमारे आपके घरों की.
'क्या ये सवाल मैं खड़ा कर रहा हूं. नहीं, ये सवाल ख़ुद-ब-ख़ुद अपने पैरों पर ख़ुद खड़े हैं.'
मुल्क के कुछ सीन व्हाट्सएप, फ़ेसबुक पर आए इंस्पायरिंग मेसेज लगते हैं. जिन्हें हम डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर शेयर करने में देर नहीं लगाते हैं.
जैसे बुर्का पहने औरत का किसी नन्हें कान्हा को गोद में ले जाना. या कांवड़ियां को सफ़ेद टोपी वाले का पानी पिलाना. पर ये सब अब स्क्रीन पर ही देखने की आदत ज़्यादा हो गई है.
असल ज़िंदगी में मुल्क के अलग-अलग टुकड़ों पर अंकित सक्सेना और रकबर जैसों की लाशें उगी आ रही हैं. ऐसे में जब आरती मोहम्मद मुराद अली के माथे पर तिलक लगाती है या मुराद अली मंदिर के पास बैठकर चाय पीता है तो लगता है कि फ़ोन पर एक इंस्पायरिंग मेसेज आया है. नाचना गाना तो ठीक है, लेकिन हम खाना नहीं खाते हैं इन लोगों का.'' इन लोग यानी हिंदू, मुस्लिम, शिया, सुन्नी, ब्राह्मण, दलित, ठाकुर.
कुछ अपवाद हैं, जैसे कलाम, अब्दुल हामिद. मुल्क फ़िल्म में जज (कुमुद मिश्रा )कहता है कि अपवाद सिर्फ़ ये नहीं कई और हैं.
लेकिन उन कई और के बारे में पढ़ने की फुर्सत न तो संतोष आनंद (आशुतोष राणा) जैसों को है न उन लाखों लोगों को, जो 'देखते ही शेयर करें' माहौल में पल बढ़ रहे हैं.
या ये कहें कि हम सब 'सत्य ज़्यादा आवश्यक है या न्याय' की लड़ाई में उलझे हुए लोग हैं. यक़ीनन सत्य और न्याय की परिभाषाएं भी हमने वैसे ही बुनी हैं, जैसे कुछ लोगों ने जेहाद की और कुछ ने अखंड भारत की. इंग्लिश में बोलें तो 'रिलिजियस तुकबंदी'
ऐसी ही धार्मिक तुकबंदी का शिकार भारत, पाकिस्तान, अमरीका, सीरिया और म्यांमार जैसे मुल्कों में कितने ही बिलाल (मनोज पाह्वा) हुए जा रहे हैं.
ग़लती इतनी कि वो बाप थे. एक आतंकी के बाप. जांच भी ज़रूरी, दोषियों को सज़ा भी और निर्दोष का बाइज्ज़त बरी होना भी. हीं ज़रूरी है तो उस टोपी को देखना जो बिलाल के सिर पर थी. एक बार सोचिएगा, दुनिया साफ़ देखने के लिए हमें आपको चश्मा साफ़ करने की ज़रूरत नहीं है?
डिलाइट सिनेमा से फ़िल्म देखकर बाहर आए सुधीर कुमार आर्या मुल्क देखकर भावुक हो गए थे. कहने लगे, ''जी भरा हुआ है मेरा. कुछ नेता हमको लड़वा रहे हैं. मेरे कुछ दोस्त मुसलमान हैं, वो मुझसे भी अच्छे हैं. सब लोग देखें कि न कोई मुसलमान है न कोई हिंदू हैं. पहले हम हैं.''
मुल्क में दो तरह के जज हैं. एक मुल्क फ़िल्म वाला जज, जो कहता है, 'संविधान के पहले पन्ने की कॉपी का प्रिंट करवाकर रखो.
कोई हम और वो की बात करें तो ऐसे लोगों के मुंह पर संविधान का पहला पन्ना मार दीजिए. या जब भी कभी ये हो रहा है तो जाकर कैलेंडर देखिए कि चुनाव में कितना वक़्त है.' एक पर्दे से बाहर वाले जज, जिनमें से कुछ की परिभाषाएं धर्म से होकर गुज़रती हैं.
मुल्क फ़िल्म वाले जज की बात न मानने पर आप, हम भी उस धार्मिक राजनीति का शिकार होते रहेंगे, जो 'कपोल कल्पनाओं' यानी प्रिज़म्पसन पर आधारित है.
कपोल कल्पनाएं, जो आपको हमें धीरे-धीरे भयाक्रांत करती रहेंगी और हम इससे बचने के लिए अपने-अपने घरों की छत पर लगे स्पीकरों से बस अरबी-हिंदी में यही कहते रह जाएंगे- धर्म की जय हो...