Friday, August 31, 2018

भटके हिन्दू-मुसलमानों का अड्डा बनता यह 'मुल्क' किसका

दानिश को ख़ुद चुभने लगी हैं, लाउडस्पीकरों से पांच बार आती वो आवाज़ें, जो अब घंटियों के साथ आती आवाज़ों से टकरा रही हैं. कुछ अभियानों में स्वच्छ भारत बनाने की अच्छी कोशिशें हो रही हैं.
लेकिन उसी वक़्त में कहीं चलते दूसरे अभियानों ने स्वच्छ हुई सड़कों पर किसी एक मज़हब का ख़ून गिराकर चोट पहुंचाई है.
अभियान ही अभियानों की काट कर रहे हैं, लेकिन इन अभियानों के जुटान में दिख रही मुंडियां किसकी हैं? हमारे आपके घरों की.
'क्या ये सवाल मैं खड़ा कर रहा हूं. नहीं, ये सवाल ख़ुद-ब-ख़ुद अपने पैरों पर ख़ुद खड़े हैं.'
मुल्क के कुछ सीन व्हाट्सएप, फ़ेसबुक पर आए इंस्पायरिंग मेसेज लगते हैं. जिन्हें हम डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर शेयर करने में देर नहीं लगाते हैं.
जैसे बुर्का पहने औरत का किसी नन्हें कान्हा को गोद में ले जाना. या कांवड़ियां को सफ़ेद टोपी वाले का पानी पिलाना. पर ये सब अब स्क्रीन पर ही देखने की आदत ज़्यादा हो गई है.
असल ज़िंदगी में मुल्क के अलग-अलग टुकड़ों पर अंकित सक्सेना और रकबर जैसों की लाशें उगी आ रही हैं. ऐसे में जब आरती मोहम्मद मुराद अली के माथे पर तिलक लगाती है या मुराद अली मंदिर के पास बैठकर चाय पीता है तो लगता है कि फ़ोन पर एक इंस्पायरिंग मेसेज आया है. नाचना गाना तो ठीक है, लेकिन हम खाना नहीं खाते हैं इन लोगों का.'' इन लोग यानी हिंदू, मुस्लिम, शिया, सुन्नी, ब्राह्मण, दलित, ठाकुर.
कुछ अपवाद हैं, जैसे कलाम, अब्दुल हामिद. मुल्क फ़िल्म में जज (कुमुद मिश्रा )कहता है कि अपवाद सिर्फ़ ये नहीं कई और हैं.
लेकिन उन कई और के बारे में पढ़ने की फुर्सत न तो संतोष आनंद (आशुतोष राणा) जैसों को है न उन लाखों लोगों को, जो 'देखते ही शेयर करें' माहौल में पल बढ़ रहे हैं.
या ये कहें कि हम सब 'सत्य ज़्यादा आवश्यक है या न्याय' की लड़ाई में उलझे हुए लोग हैं. यक़ीनन सत्य और न्याय की परिभाषाएं भी हमने वैसे ही बुनी हैं, जैसे कुछ लोगों ने जेहाद की और कुछ ने अखंड भारत की. इंग्लिश में बोलें तो 'रिलिजियस तुकबंदी'
ऐसी ही धार्मिक तुकबंदी का शिकार भारत, पाकिस्तान, अमरीका, सीरिया और म्यांमार जैसे मुल्कों में कितने ही बिलाल (मनोज पाह्वा) हुए जा रहे हैं.
ग़लती इतनी कि वो बाप थे. एक आतंकी के बाप. जांच भी ज़रूरी, दोषियों को सज़ा भी और निर्दोष का बाइज्ज़त बरी होना भी. हीं ज़रूरी है तो उस टोपी को देखना जो बिलाल के सिर पर थी. एक बार सोचिएगा, दुनिया साफ़ देखने के लिए हमें आपको चश्मा साफ़ करने की ज़रूरत नहीं है?
डिलाइट सिनेमा से फ़िल्म देखकर बाहर आए सुधीर कुमार आर्या मुल्क देखकर भावुक हो गए थे. कहने लगे, ''जी भरा हुआ है मेरा. कुछ नेता हमको लड़वा रहे हैं. मेरे कुछ दोस्त मुसलमान हैं, वो मुझसे भी अच्छे हैं. सब लोग देखें कि न कोई मुसलमान है न कोई हिंदू हैं. पहले हम हैं.''
मुल्क में दो तरह के जज हैं. एक मुल्क फ़िल्म वाला जज, जो कहता है, 'संविधान के पहले पन्ने की कॉपी का प्रिंट करवाकर रखो.
कोई हम और वो की बात करें तो ऐसे लोगों के मुंह पर संविधान का पहला पन्ना मार दीजिए. या जब भी कभी ये हो रहा है तो जाकर कैलेंडर देखिए कि चुनाव में कितना वक़्त है.' एक पर्दे से बाहर वाले जज, जिनमें से कुछ की परिभाषाएं धर्म से होकर गुज़रती हैं.
मुल्क फ़िल्म वाले जज की बात न मानने पर आप, हम भी उस धार्मिक राजनीति का शिकार होते रहेंगे, जो 'कपोल कल्पनाओं' यानी प्रिज़म्पसन पर आधारित है.
कपोल कल्पनाएं, जो आपको हमें धीरे-धीरे भयाक्रांत करती रहेंगी और हम इससे बचने के लिए अपने-अपने घरों की छत पर लगे स्पीकरों से बस अरबी-हिंदी में यही कहते रह जाएंगे- धर्म की जय हो...

Friday, August 17, 2018

抗灾与致富:中资旅游项目的海岛难题

4月13日,国际海事组织( )173个成员国签署协议,同意到2050年将海运二氧化碳排放量降至2008年水平的一半,并逐步朝着零排放的目标迈进。

各国还同意到2030年将国际航运业的碳排放强度(每吨英里二氧化碳排放量)相对于2008年减少至少40%,并且力争到2050年减少70%。该协议还重点强调了若有可能,到2050年将减排目标提高到100%。

2015年签订的《巴黎气候协定》并未将船运和航空运输业纳入减排范畴,但条件是,这两个部门需在《巴黎协定》签订后尽快出台自己的减排计划。2016年10月,国际民航组织( )达成减排协议后,唯一没有出台气候变化减缓计划的就只剩下船运行业了。

由于一直未能就减排目标作出承诺,国际海事组织承受着来自国际社会越来越大的压力。其中欧盟的最大。去年11月份,欧洲议会通过一项议案,自2023年起,船运行业将被纳入欧盟碳排放交易体系( ),除非国际海事组织能够通过一项雄心勃勃的减排计划。

据国际海事组织2014年的一份报告,海事部门的温室气体排放占全球总排放的2%-3%,但随着全球贸易的增长,预计到2050年,这一数字将增长 %- %。由于包括中国、巴西、日本在内的一些国家认为,收紧排放限制将损害他们的经济,因此有关减少该部门环境影响的谈判一拖再拖。

然而,近期的研究列举了一些该部门实现脱碳的机会。经济合作与发展组织( )3月发表的一份研究认为,利用现有技术,到2035年该部门 “几乎可以完全实现脱碳”。

劳氏船级社和海事资讯服务研究院的分析师们在另一份报告中指出,从竞争力上来说,2030年之前,零排放船只可能无法与传统航运相抗衡。然而,报告表示,随着技术的迅猛发展,未来十年,二者之间差距缩小的速度要远远超过预期。在经历了两周激烈的谈判之后,成员国终于在上周五达成了协议。包括马绍尔群岛在内的小岛屿国家在海平面上升面前尤为脆弱。他们力主到2035年前实现彻底脱碳,而欧盟成员国建议到2050年将温室气体排放消减70%-100%。

巴西和阿根廷一直反对制定绝对减排目标的提议,认为自己国家所处的地理位置远离其他市场,这就意味着降低船速等措施会使他们处于不利的竞争地位,尤其是对生鲜产品的出口而言。

中国尽管自己没有提出任何减排议案,但之前也一直反对绝对减排目标。可这一次,中国和阿根廷并没有对协议提出异议。只有美国和沙特阿拉伯发表正式声明,对协议草案表示反对,而巴西只对协议草案中的绝对减排目标提出了异议。

环保组织“运输与环境”(T&E)负责海运事务的官员费格·阿巴索夫指出,事实上,有65个国家在此次IMO会议最后的闭幕致辞环节中表达了对该减排战略的支持,只有3个国家表示反对或部分反对。

 “可能中国不想看起来太孤立,毕竟三分之一和六十五分之一的差距还蛮大的。所以,中国在致辞中对该战略表示了欢迎。”

一位与会的观察人士说,会议主席斋藤秀明宣布大会通过减排战略后,中国是第一个发表意见的代表团。中国代表团对大会通过航运业减少温室气体排放的初步战略表示欢迎,并形容其是一项体察入微、兼容并蓄的协议。中方还表示,该协议传达出船运行业必将走向零排放未来的强有力的信号。尽管与一些主张达成更高减排目标的国家所希望的相比,这份协议明显要弱很多,但活动人士仍对其表示一致欢迎,称其是一项“有可能改写潮流”的协议,并且会向整个行业传达出强有力的信号。

伦敦大学学院能源研究所能源及航运专业讲师特里斯坦•史密斯博士表示,航运业需要加快零排放船只生产技术的革新,从以化石燃料为动力,转向以混合电力(电池)、氢能源、以及生物能等可再生能源为动力。

“这种革新对一个拥有超过5万艘船、足迹遍布世界各个角落的全球性产业来说意义重大。英国主导的研究表明,通过加大投资和加强监管,这些减排目标是可以实现的,”他说道。

 “运输与环境”(T&E)航运部门主任比尔·海明斯说:“这一决定让航运业走上了正轨。如今, ‘脱碳’的概念,以及航运部门的减排需要都被正式写入了协议,这对于落实《巴黎协定》的减排目标至关重要。”

 “国际航运协会”(ICS)称该协定是一项 “突破”。协会秘书长彼得·欣奇利夫说:“这次达成的行业减排目标的确很有魄力。不光是到2050年要将行业温室气体排放总量消减至少50%,而且还要在此基础上继续加大减排力度。在未来全球贸易和人口增长、以及经济持续向好的预期下,能够达成这一目标尤为不易。”

他认可一些国家政府想要达成更加积极的目标的想法,但是他说,只有零排放燃料得到广泛应用的前提下才能落实到2050年消减50%温室气体排放的目标。

“ICS认为,如果能够顺利完成50%的消减目标,那么之后整个航运业的零排放燃料转型就会非常顺利。”可是,“清洁航运联盟”(CSC)下属的一些组织指出,目前还没有清晰的行动计划来确保上述目标的实现,而且也亟需采取一些短期措施。

CSC总裁及“海上风险”( )高级政策顾问约翰·迈格斯说:“下一步的进展才是关键。IMO必须立刻采取措施在短期内大幅、快速地消减温室气体排放。如果不采取措施,《巴黎协定》的目标就无法实现。”

伦敦大学学院称,单是这项减排战略并不能确保船运部门在实现全球1.5摄氏度温升控制目标的过程中发挥作用,但却的确可以增加实现这一目标的可能性,只要各国达成一致意见,立刻采取措施在2023年前落实这项战略,并大幅消减温室气体排放。

今年晚些时候,政府间气候变化专门委员会(IPCC)将根据一份报告对这项战略进行评议。IPCC正在考虑采取何种措施才能实现《巴黎协定》中将全球气温升高控制在1.5摄氏度以内的目标。

阿巴索夫说:“这项协议并不是具有约束力的决议,只不过是一份承诺。重要的是要有具有约束力的监管措施和强制性措施。具体的行动计划将在12月举行的IMO环境会议上讨论。我们本来希望能在这周的会议上就讨论这个问题,但不幸的是,这个问题与战略问题的讨论分开了。 ”

这个观点也得到了荷兰绿党成员巴斯•艾克浩特的支持,他一直呼吁IMO能够拿出更大的魄力减排。他在推特中写道:“虽不足以兑现《巴黎协定》中的目标,但对国际航运业来说是向前迈出的一大步。下一步要做的是:尽快采取切实行动,我们等不起了。”

Tuesday, August 14, 2018

क्या मरने के बाद … मुझे सुरक्षा देंगे?- उमर ख़ालिद

अंदर को धंसी लेकिन चमकीली आंखोंवाले उस युवक पर एक दिन पहले ही जानलेवा हमला हुआ है, लेकिन उसके दो मंज़िला घर या आसपास दूर-दूर तक पुलिस का नामो-निशां तक नहीं.
किस चीज़ का इंतज़ार कर रही है दिल्ली पुलिस, हमले के तक़रीबन 24 घंटे बाद तक सुरक्षा मुहैया न करवाए जाने के सवाल पर छात्र नेता और जेएनयू के पूर्व छात्र उमर ख़ालिद गंभीर अंदाज़ में कहते हैं.
"क्या मरने के बाद … मुझे सुरक्षा देंगे?" वो अपनी बात पूरी करते हैं.
लेकिन उमर ख़ालिद की आवाज़ में किसी तरह का ग़ुस्सा नहीं है, हां, चेहरे पर हादसे के बाद की थकान ज़रूर झलक रही है. धमकियां तो उन्हें लंबे समय से मिल रही थी, लेकिन सोमवार को मौत पिस्तौल की शक्ल में उमर ख़ालिद के सीने पर आ टिकी थी.
उमर ख़ालिद और उनके दोस्तों- शारिक़ हुसैन और ख़ालिद सैफ़ी का कहना है कि सफ़ेद शर्ट पहने हुए ह्रष्ट-पुष्ट हमलावर ने गोली भी दाग़ी, हालांकि पुलिस कह रही है कि भरी हुई पिस्तौल जाम हो गई थी और गोली चली या नहीं इसकी जांच हो रही है.
उमर ख़ालिद के पिता एसक्यूआर इलियास ने इस बात पर आश्चर्य प्रकट किया कि हमला सुरक्षा की दृष्टि वाले इतने संवेदनशील इलाक़े में हुआ (घटनास्थल संसद भवन से महज़ आधा किलोमीटर की दूरी पर है), फिर भी पुलिस हादसे के 15 मिनट बाद वहां पहुंची.
एसक्यूआर इलियासी वेलफेयर पार्टी ऑफ़ इंडिया नाम के एक राजनीतिक दल के कर्ता-धर्ता हैं और जमाते इस्लामी से जुड़े रहे हैं.
हालांकि उमर ख़ालिद ख़ुद को नास्तिक बताते हैं और उनका ताल्लुक़ वामपंथी विचारधारा से रहा है.
दक्षिणी दिल्ली में उमर ख़ालिद के घर में टीवी चैनल्स और वेबसाइट्स के पत्रकार इंटरव्यू के लिए पहुंचे हुए हैं जिनमें से कुछ उस सवाल को भी उमर ख़ालिद पर उछालते हैं जो सोशल मीडिया पर ख़ूब दोहराया जा रहा है कि 'ये हमला महज़ एक स्टंट था.'
ठहरे हुए अंदाज़ में छात्र नेता कहते हैं कि मौत उतनी डरावनी नहीं जितना आजकल एक विशेष वर्ग का मौत को लेकर जश्न मनाना है.
उन सोशल पोस्ट पर जिनमें उन (उमर ख़ालिद) से कहा गया है कि वो बच क्यों गए, उमर ख़ालिद जानी-मानी पत्रकार गौरी लंकेश का ज़िक्र करने लगते हैं जिन्हें बैंगलुरू में गोली मारे-जाने के बाद कुछ लोग सोशल मीडिया पर उनकी मौत को जायज़ ठहरा रहे थे, उन्हें 'कुतिया' तक कह रहे थे, ऐसा अपशब्द कहनेवाले एक व्यक्ति के तो ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ट्विटर पर फॉलोवर रहे हैं.
कर्नाटक पुलिस ने गौरी लंकेश हत्या मामले में 14 लोगों को गिरफ़्तार किया है जिनमें से अधिकतर का संबंध कथित तौर पर हिंदुत्ववादी विचारधारा वाले संगठनों से है.
कहा जा रहा है कि जिस तरह से गौरी लंकेश की हत्या हुई वो एमएम कलबुर्गी, गोविंद पंसारे और नरेंद्र डाभोलकर की हत्याओं के तरीक़े से काफी हद तक मेल खाती है.
ये सभी लोग हिंदुत्ववादी राजनीति के विरोधी रहे थे.
वो कहते हैं कि फ़रवरी 2016 के बाद का वक़्त उनके लिए बहुत मुश्किलों भरा था जब उनपर भारत-विरोधी नारे लगाने के आरोप लगे थे, लेकिन "मुश्किलों ने उन्हें मुश्किलों से लड़ना सिखाया और वो अपनी पीएचडी यूनिवर्सिटी में दाखिल कर पाये."
उनके मुताबिक़ उनके लिए पीएचडी दाख़िल करना इसलिए भी बहुत अहम था क्योंकि इस तरह का दुष्प्रचार फैलाया जा रहा था कि जेएनयू में पढ़ाई नहीं राजनीति होती है और वहां टैक्स देनेवालों का पैसा उड़ाया जाता है.
"मैं राजनीतिक हूं लेकिन अपनी पढ़ाई को लेकर भी उतना ही सीरियस हूं," वो कहते हैं.
उमर ख़ालिद पर देशविरोधी नारे लगाने के मामले को हालांकि ढाई साल बीत गए हैं लेकिन अभी तक इस केस में आरोपपत्र तक दाखिल नहीं हुआ है, जिसके बारे में उमर का कहना है कि ये दर्शाता है कि पूरा मामला बस दुष्प्रचार का था और इसे लेकर पुलिस या सरकार कभी सीरियस थी ही नहीं.
इन्हीं बातों के बीच उमर ख़ालिद छोटी बहन से कहते हैं कि वो सबके लिए चाय बनवाएं, बहन के ये पूछने पर कि कितनी, हंसते हुए उनका जवाब होता है कि भई जितने लोग हैं उतनी बनवा लीजिए न.
वहां बैठे एक पत्रकार मुस्कुराते हुए कहते हैं कल के इतने बड़े हमले के बाद भी आप हंस बोल रहे हैं, उमर ख़ालिद अंग्रेज़ी में जवाब देते हैं मैं जीवित हूं इसलिए ख़ूश हूं, लेकिन मैंने फैसला किया है कि मैं जब तक जीवित हूं तब तक खुश रहूंगा.

Monday, August 13, 2018

दूसरों के स्पर्म से मां क्यों बन रही हैं महिलाएं?

दुनिया भर में वैसी महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है जो स्पर्म ख़रीद कर मां बन रही हैं. ऐसी महिलाएं शादी नहीं कर रही हैं और आईवीएफ़ का सहारा लेकर बिना यौन संबंध बनाए मां बन रही हैं.
पॉली केर भी उन्हीं महिलाओं में से हैं जो किसी और के स्पर्म से मां बनी हैं.
ऑक्सफ़ोर्ड की 39 साल की पॉली ने एक गुमनाम स्पर्म डोनर के स्पर्म से पिछले साल गर्भ धारण किया था और इस साल की शुरुआत में उन्होंने एक बच्चे को जन्म दिया.
इस प्रक्रिया में स्पर्म को एक प्रयोगशाला में गर्भाधान कराया जाता है. आईवीएफ़ को वैसे कपल भी आजमाते हैं जो किन्हीं वजहों से मां या पिता बनने में समर्थ नहीं होते हैं.
पॉली ने कहा, ''मैं बिल्कुल तैयार थी और जानती थी कि अगर मैं मां बनना चाहती हूं तो आईवीएफ़ को ही अपनाना होगा. जब मैं 36 या 37 साल की थी तो इसके बारे में गंभीरता से सोचना शुरू किया. मैं कभी रिलेशनशिप में नहीं रही. ऐसे में अगर मैं आईवीएफ को नहीं अपनाती तो मां कभी नहीं बन पाती.''
उन्होंने कहा, ''मैं हैरान थी कि मेरे परिवार वालों ने इसे बड़ी सहजता से स्वीकार किया.'' ब्रिटेन में सरकार के आंकड़ों के मुताबिक़ सिंगल वुमन बनने का चलन बढ़ा है. 2014 से तो ब्रिटेन में इसमें 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है.
ऑक्सफ़ोर्ड फ़र्टिलिटी के मेडिकल निदेशक का कहना है कि उन्होंने 20 से ज़्यादा सिंगल महिलाओं का इलाज किया है. उनका कहना है कि जैसे-जैसे जागरूकता बढ़ेगी वैसे-वैस सिंगल वुमन का चलन भी बढ़ेगा.
ऑक्सफ़ोर्ड फ़र्टिलिटी का कहना कि लोग अब बच्चे को बिल्कुल अकेले जन्म देना चाहते हैं. लोग या तो स्पर्म ख़रीद ले रहे हैं या फिर अंडाणु ख़रीद ले रहे हैं. भारत में ये ट्रेंड हाल के दिनों में देखने को मिला है. पिछले साल ही फ़िल्मकार करण जौहर और तुषार कपूर ने ऐसा किया था.
हालांकि आईवीएफ़ महंगा पड़ता है. ब्रिटेन में लगभग सात लाख रुपए तक खर्च हो जाते हैं. आईवीएफ़ सफल रहेगा या नहीं यह महिलाओं के अंडाणु पर निर्भर करता है और साथ ही स्पर्म की गुणवत्ता पर. ऑक्सफ़ोर्ड फ़र्टिलिटी में आईवीएफ़ की कामयाबी दर 30 से 50 फ़ीसदी के बीच है.
भारत में भी स्पर्म और अंडाणु बेचने का चलन बढ़ा है. इसकी कई वजह बताई जा रही है. एक तो यह कि जो ज़्यादा उम्र में शादी कर रहे हैं उनके लिए मां या बाप बनने में काफ़ी दिक़्क़तें होती हैं. ऐसे में आईवीएफ़ एकमात्र सहारा होता है. स्पर्म की तरह अंडाणु डोनेट करना आसान नहीं होता है. यह काफ़ी जटिल प्रक्रिया है और इसमें 15 दिन लगते हैं.
भारत में नियम के मुताबिक उन महिलाओं से अंडे लिए जाते हैं जो मां बन चुकी हैं ताकि उन्हें फिर से मां बनने में कोई दिक्क़त नहीं हो. अंडे को महिला के शरीर से इंजेक्शन के ज़रिए बाहर निकाला जाता है. इन अंडों से जिस पुरुष को बच्चा पैदा करना है उसके स्पर्म से मिलाया जाता है.
स्पर्म और अंडे को मिलाकर बेबी (एंब्रियो) बनाया जाता है. एंब्रियो को उस महिला के गर्भ में डालने के लिए कोई सर्जरी नहीं करनी पड़ती है.
बस एक लाइन बनाकर महिला के शरीर में डाल दिया जाता है. 15 दिनों के भीतर पता चल जाता है कि गर्भ ठहर गया है. सरोगेट और डोनर को लेकर गोपनीयता का कॉन्ट्रैक्ट होता है.
पिछले साल मोदी सरकार ने एक बिल पेश किया था जिसमें अब कोई सिंगल पेरेंट नहीं बन सकता है. अब सरोगेसी के ज़रिए वही पैरेंट बने सकते हैं जिन्होंने भारतीय क़ानून के मुताबिक शादी की है.
यह बिल अभी संसदीय समिति के पास है. इस बिल के ड्राफ्ट होने के बाद से ही सिंगल पैरेंट को लेकर आईवीएफ सेंटर सतर्क हो गए हैं. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा था कि यदि किसी को सिंगल पैरेंट बनना है तो वह बच्चों को गोद ले न कि इस सुविधा को शौक के रूप में इस्तेमाल किया जाए.