Tuesday, May 28, 2019

शहर में चार दशकों से काम कर रहे वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद भार्गव

इसके अलावा अख़बार ने अमेठी में स्मृति इरानी के लिए प्रचार करने वाले सुरेंद्र सिंह की हत्या से जुड़ी ख़बर को पहले पन्ने पर जगह दी है. अख़बार के अनुसार, सुरेंद्र की हत्या चुनावी रंज़िश का नतीजा थी. पुलिस ने इस मामले में अभी तक तीन लोगों को गिरफ़्तार किया है.
पहले नाम पूछा फिर गोली मार दी
द हिंदू के अख़बार ने बेगूसराय में युवक को नाम पूछकर गोली मारने की घटना को पहले पन्ने पर जगह दी है. अख़बार के मुताबिक, बिहार के बेगूसराय में मोहम्मद कासिम से पहले उनका नाम पूछा गया और उसके बाद उन्हें गोली मार दी गई. स्थानीय थाने में एफ़आईआर दर्ज की गई है. लेकिन अभी तक इस मामले में किसी की गिरफ़्तारी नहीं हुई है.
जापान के कावासाकी शहर में एक हमलावर ने बस का इंतज़ार कर रहे स्कूली बच्चों पर चाकू से हमला कर दिया. बताया जा रहा है कि हमले में दो लोगों की मौत हो गई है और कम-से-कम 16 लोग घायल हैं. पुलिस ने हमले में एक लड़की के मारे जाने की पुष्टि की है.
संदिग्ध ने गिरफ़्तारी से पहले अपनी गर्दन पर भी चाकू हमला किया. रिपोर्टों के मुताबिक अब उसकी मौत हो गई है. हमले का मक़सद अभी स्पष्ट नहीं है.
सरकारी प्रसारक एनएचके के मुताबिक पुलिस को मौके से दो चाकू बरामद हुए हैं.
कावासाकी अग्नीशमन विभाग के एक कर्मचारी ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया है कि हमले के बारे में पहली कॉल स्थानीय समयानुसार सुबह 07.44 बजे की गई थी.
एक चश्मदीद ने एनएचके से कहा, "मैंने बस स्टॉप के पास एक व्यक्ति को रक्तरंजित देखा. स्कूली बच्चे भी सड़क पर पड़े थे. ये एक शांत जगह है. यहां इस तरह का दृश्य देखना परेशान करने वाला है."
जापान के कावासाकी शहर में एक हमलावर ने बस का इंतज़ार कर रहे स्कूली बच्चों पर चाकू से हमला कर दिया. बताया जा रहा है कि हमले में दो लोगों की मौत हो गई है और कम-से-कम 16 लोग घायल हैं. पुलिस ने हमले में एक लड़की के मारे जाने की पुष्टि की है.
संदिग्ध ने गिरफ़्तारी से पहले अपनी गर्दन पर भी चाकू हमला किया. रिपोर्टों के मुताबिक अब उसकी मौत हो गई है. हमले का मक़सद अभी स्पष्ट नहीं है.
सरकारी प्रसारक एनएचके के मुताबिक पुलिस को मौके से दो चाकू बरामद हुए हैं.
कावासाकी अग्नीशमन विभाग के एक कर्मचारी ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया है कि हमले के बारे में पहली कॉल स्थानीय समयानुसार सुबह 07.44 बजे की गई थी.
एक चश्मदीद ने एनएचके से कहा, "मैंने बस स्टॉप के पास एक व्यक्ति को रक्तरंजित देखा. स्कूली बच्चे भी सड़क पर पड़े थे. ये एक शांत जगह है. यहां इस तरह का दृश्य देखना परेशान करने वाला है."
50 के दशक तक ग्वालियर के सिंधिया राज घराने के 'समर कैपिटल' के तौर पर मशहूर रहा शिवपुरी शहर आज 2019 की गर्मियों में 46 डिग्री पर तप रहा है. शहर में प्रवेश करते ही चारों ओर चक्कर लगाते पानी के टैंकर ध्यान खींचते हैं.
29 नंबर वार्ड के सइसपुरा मोहल्ले में सड़क के किनारे खड़े एक टैंक से मटके में पानी भरते स्थानीय नागरिक अजय सिंह बताते हैं कि शहर में लंबे वक़्त से पानी की समस्या रही है.
"यहां पानी का बड़ा संकट है. कई महीनों से तो हम लोगों को पीने का पानी भी खरीदकर पीना पड़ रहा है. इसी वजह से लोग ग़ुस्से में हैं. तभी इस चुनाव में पहली बार महाराज भी हार गए."
शिवपुरी शहर मध्यप्रदेश के गुना लोकसभा क्षेत्र का संसदीय मुख्यालय है और जिन 'महाराज' का ज़िक्र अजय ने अपनी बात में किया वह सिंधिया घराने के वारिस और गुना लोकसभा क्षेत्र के पूर्व सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं.
2002 से 2014 तक लगातार चार बार गुना लोकसभा सीट से जीतते आ रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी पाँचवीं चुनावी लड़ाई भारतीय जनता पार्टी के कृष्णपाल सिंह यादव से 1,25,549 वोटों के भारी अंतर से हर गए.
2019 के चुनावों में गुना लोकसभा सीट के नतीजे मध्यप्रदेश कांग्रेस के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी पार्टी के लिए निराशा का कारण बन कर उभरे हैं. ख़ास तौर पर इसलिए क्योंकि इस सीट को सिंधिया परिवार का गढ़ माना जाता रहा है.
मध्यप्रदेश के अस्तित्व में आने के बाद से ही विजया राजे सिंधिया, माधव राव सिंधिया और ज्योतिरादित्य सिंधिया समेत सिंधिया परिवार के अलग-अलग सदस्य इस सीट से जीतते रहे हैं. साथ ही ज्योतिरादित्य सिंधिया की यह हार इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज़ादी के बाद यह ग्वालियर राजघराने या 'महल' के किसी व्यक्ति की पहली चुनावी हार है.
लेकिन सिंधिया परिवार के गढ़ में पहली बार सेंध लगाने वाली भाजपा की इस जीत और ज्योतिरादित्य सिंधिया की इस ऐतिहासिक हार के कारणों पर आने से पहले मध्यप्रदेश की राजनीति में सिंधिया परिवार के महत्व को समझना ज़रूरी है.
शिवपुरी शहर में मौजूद सिंधिया परिवार के पुरखों की याद में बनी 'छतरी' के प्रबंधन अधिकारी अशोक मोहिते रजवाड़ों के समय के पुराने दस्तावेज़ दिखाते हुए बताते हैं, "इस राजघराने की शुरुआत 1740 के आसपास राणो जी सिंधिया ने की थी. वह मराठा हिंदू योद्धा थे और सबसे पहले मालवा क्षेत्र पर फ़तह कर उन्होंने उज्जैन को अपनी पहली राजधानी बनाया."
"फिर 1800 तक आते-आते, शाजापुर से होते हुए ग्वालियर सिंधिया परिवार की राजधानी हो गई. तब से लेकर आज़ादी तक, शिवपुरी, शयोपुर और गुना का यह पूरा क्षेत्र ग्वालियर राजघराने के सिंधिया परिवार की रियासत का हिस्सा था. पहले शिवपुरी में बहुत हरियाली और कई झरने-तालाब हुआ करते थे. तब सिंधिया परिवार यहां अपने गर्मियों के दिन बिताने आता था".
आज़ाद भारत में सिंधिया परिवार की राजनीतिक भूमिका के बारे में बात करते हुए अशोक कहते हैं, "ग्वालियर राजघराने के महाराज जीवाजी राव सिंधिया आज़ादी के बाद बने 'मध्य भारत' के पहले राजप्रमुख थे. फिर 1956 के बाद मध्यभारत का विलय करके मध्यप्रदेश बनाया गया."
"इसके बाद साल 1957 में नए मध्यप्रदेश में जो पहला चुनाव हुआ, उसमें जीवाजी महाराज की पत्नी राजमाता विजया राजे सिंधिया ने इसी गुना लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत गयीं. तब से ही यह परिवार इस सीट पर जीतता रहा है." देलखंड और चंबल से घिरे शिवपुरी-गुना अंचल की 80 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है. उद्योगों और रोज़गार की कमी से जूझते इस इलाक़े को नीति आयोग ने देश के सबसे पिछड़े ज़िलों की सूची में शुमार किया है.
शहर में प्रवेश करते ही आपको टूटी और खुदी हुई सड़कें और सड़कों पर पानी के इंतज़ार में क़तारों में खड़े लोग नज़र आएँगे. ऐसे में इस बार के नतीजों में ज्योतिरादित्य के हार को इस इलाक़े के पिछड़ेपन और सिंधिया परिवार के 'राजशाही' के ख़िलाफ़ लोगों के ग़ुस्से के तौर पर देखा जा रहा है. लेकिन ज़मीन पर सच्चाई काले और सफ़ेद से इतर है.
पानी भरने की क़तार में खड़े स्थानीय निवासी नारायण बाथम कहते हैं कि जनता की तकलीफ़ों से जुड़ी सारी शिकायतें सही हैं लेकिन फिर भी 'महाराजा' को नहीं हारना चाहिए था.
"हम सब यही सोच रहे थे कि सरकार तो मोदी की बनेगी लेकिन यहां से तो महाराज जीत ही जाएँगे. पानी, रोज़गार और सीवर की समस्या तो यहां बहुत बड़ी है. शायद इसलिए इस बार लोगों ने महाराज को हरा दिया वर्ना मैं कितने सालों से वोट डालता हूँ, महाराज कभी नहीं हारते थे."
वहीं पास खड़े आशीष दीवान कहते हैं, "वो शिवपुरी के महाराज हैं और हम यहां रहने वाले लोग, उनके अन्नदाता. महाराज से तो यहां के लोगों का जुड़ाव हमेशा बना रहेगा. यूं तो महाराज का हारना अच्छा नहीं होता लेकिन फिर भी इस बार जनता ने उनको हरा दिया. दरअसल हमें पानी और रोज़गार की बहुत समस्या है."
"महाराज सीवर का प्रोजेक्ट लाए थे और फिर उसके चलते पूरे शहर की सड़कें खोद दी. सड़कें ख़ुद तो गयीं लेकिन वापस कभी नहीं भरी गयीं. सीवर अभी तक नहीं लगा. इसलिए शायद लोगों ने इस बार उन्हें वोट नहीं दिया. लेकिन महाराज तो वो रहेंगे ही."
शिवपुरी-गुना की जनता में आज भी सिंधिया परिवार को लेकर डर और सम्मान का मिला जुला भाव है. लोकतंत्र में 70 साल बिताने के बाद भी यहां के लोगों के ज़ेहन में बैठी 'राजशाही' की छाया ही वह कारण है जिसकी वजह से मूलभूत सुविधाओं के लिए तरसने के बावजूद यहां के लोगों ने हमेशा सिंधिया परिवार के नुमाइंदों को चुनावों में जिताया.
आज ज्योतिरादित्य सिंधिया की करारी हार के बावजूद लोग यहां राजपरिवार के बारे में कुछ भी नकारात्मक कहने से बचाना चाहते हैं.

Wednesday, May 15, 2019

हापुड़ रेप मामला: आत्मदाह करने वाली युवती की पूरी कहानी

बीस साल की गीता (बदला हुआ नाम) बुरी तरह झुलसी हालत में दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती हैं. पिछले महीने की 28 तारीख़ को उसने ख़ुद को आग लगा कर आत्महत्या करने की कोशिश की.
उनकी कहानी हापुड़ से शुरू होकर मुरादाबाद से होते हुए दिल्ली तक आ पहुंची है.
तीन पति... दस हज़ार में सौदा...तीन बच्चे...बलात्कार के 16 अभियुक्त और आत्महत्या की कोशिश. गीता की हालत फिलहाल स्थिर है.
उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के श्यामपुरजट्ट गांव की रहने वाली 20 साल की गीता ने हापुड़ पुलिस पर आरोप लगाया है कि पुलिस ने उनके बार-बार कहने के बावजूद एफ़आईआर नहीं लिखी जिससे दुखी होकर उन्होंने ख़ुद को आग लगा ली.
हालांकि पुलिस इन आरोपों को ख़ारिज कर रही है. हापुड़ पुलिस के मुताबिक़ पूरा मामला संदिग्ध है और जांच के दायरे में है.
मामले पर संज्ञान लेते हुए दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्षा स्वाति मालीवाल ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चिट्ठी लिखी और मामले को फ़ौरन देखने का निवेदन किया. साथ में एफ़आईआर दर्ज़ हो, ये सुनिश्चित करने का आग्रह करते हुए अभियुक्तों की गिरफ़्तारी की मांग की. स्वाति मालीवाल की इस चिट्ठी पर 11 मई की तारीख़ है.
इसके बाद अगले दिन यानी 12 मई को हापुड़ के थाना बाबूगढ़ में एफ़आईआर दर्ज़ कर ली गई. एफ़आईआर में 16 लोगों को अभियुक्त बनाया गया है.
13 मई को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने भी इस मामले पर संज्ञान लिया और मीडिया रिपोर्ट को आधार बनाते हुए मुख्य सचिव और डीजीपी से रिपोर्ट मांगी.
राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी इस मामले में संज्ञान लिया है.
हापुड़ के शैसपुरा गांव की रहने वाली गीता की पहली शादी 14 साल की उम्र में मोनू (बदला हुआ नाम) से हुई थी. पहली शादी क़रीब एक साल ही चली. गीता अपने पहले बेटे को लेकर मायके आ गईं और कुछ वक़्त बाद मोनू से उसका तलाक़ हो गया.
इसके बाद, गीता की 'शादी' श्यामपुरजट्ट गांव में रहने वाले विनोद (बदला हुआ नाम) से करा दी गई.
गीता का आरोप है कि उनके पिता राम (बदला हुआ नाम) ने दस हज़ार रुपये लेकर 33 साल के विनोद से उनका सौदा किया था.
हालांकि गीता के पिता राम और विनोद दोनों ही सौदे की बात को सिरे से ख़ारिज करते हैं. विनोद ने बीबीसी से कहा कि उसने कभी भी पैसे नहीं दिए. यही दावा राम और उनकी पत्नी का भी है.
विनोद कहते हैं "मैं मज़दूर हूं. महीने का मुश्किल से छह हज़ार कमाता हूं. दस हज़ार कहां से लाऊंगा… उसके पिता ही आए थे मेरे पास शादी के लिए."
पर बाबूगढ़ थाने में गीता की ओर से दर्ज करवाई गई एफ़आईआर में कहीं भी विनोद के साथ विधिवत शादी का ज़िक्र नहीं है. एफ़आईआर के मुताबिक़ यह एक सौदा था. स्टैंप पेपर पर लिखा-पढ़ी हुई और गीता को उसके बेटे के साथ विनोद को सौंप दिया गया.
रेप के आरोप
एफ़आईआर में 16 लोगों को रेप के आरोप में अभियुक्त बनाया गया है.
गीता का आरोप है कि इन 16 लोगों ने बीते पांच सालों में उसके साथ बलात्कार किया.
गीता के बयान के मुताबिक़, विनोद ने गांव के ही एक आदमी से पैसा उधार लिया था. किसी तरह पति-पत्नी ने मिलकर मूलधन तो चुका दिया लेकिन ब्याज़ नहीं अदा कर पाए.
इसी का दबाव बनाकर उस शख़्स ने गीता के साथ बलात्कार किया. और एक बार नहीं, कई बार उसे डरा-धमकाकर उसके साथ रेप किया. इस दौरान गीता गर्भवती हो गई और उसने एक बेटे को जन्म दिया.
हालांकि विनोद इससे इनकार करता है और बेटे को अपना बताता है.
गीता की दर्ज कराई गई एफ़आईआर में ब्यौरेवार तरीक़े से और घटनास्थल की जानकारी देते हुए रेप की वारदातों का उल्लेख है.
एफ़आईआर के मुताबिक़, गीता घरों में काम करती थीं और इसी दौरान अलग-अलग लोगों ने उनका शोषण किया.
गीता का दावा है कि उन्होंने अपने पति विनोद को कई बार अपने साथ हो रहे दुराचार के बारे में बताया लेकिन पति ने हर बार उसे ही शांत रहने को कहा और उसकी बातों को अनसुना कर दिया.
हालांकि विनोद कहते हैं "गीता ने कभी ये नहीं कहा कि उसके साथ कुछ ग़लत हो रहा है."
विनोद उल्टे गीता पर ही आरोप लगाते हैं.
उनका कहना है कि गीता में ही दोष है. वरना वो गांव के ही एक तीसरे लड़के भुवन ( बदला हुआ नाम) के साथ क्यों जाती? वो भी अपने तीन छोटे-छोटे बच्चों को उसके पास छोड़कर.
एक ओर जहां विनोद, गीता पर भुवन के साथ चले जाने को ग़लत ठहराते हैं वहीं भुवन से जब हमने बात की तो उन्होंने कहा कि गीता की कोई नहीं सुन रहा था, इसलिए उन्होंने गीता का साथ देने का फ़ैसला किया.
तीसरा पति और मुरादाबाद
एफ़आईआर में भुवन को गीता का वर्तमान पति बताया गया है. यानी तीसरा पति.
तो क्या गीता और विनोद का तलाक़ हो गया है?
यह सवाल जब हमने भुवन से पूछा तो उन्होंने कहा कि तलाक़ नहीं हुआ है लेकिन गीता ने सादे काग़ज पर लिखकर दे दिया है कि वो विनोद के साथ नहीं रहना चाहती. रही बात हमारी शादी की तो हमने स्टैंप पेपर पर लिखित में शादी की है.
भुवन कहते हैं कि गीता ने उन्हें अपनी सारी आपबीती सुनाई जिसके बाद उन्होंने तय किया कि कोई और उनका साथ दे या न दे लेकिन वो गीता के साथ खड़े रहेंगे.
लेकिन आप गीता को लेकर मुरादाबाद क्यों चले गए?
इस सवाल के जवाब में भुवन कहते हैं "मैंने अपने घर में गीता को लेकर बात की किसी ने भी मेरा साथ नहीं दिया. सबने विरोध किया. सरपंच ने भी मदद नहीं की. वहीं दूसरी ओर उसे लगातार धमकियां मिल रही थीं, ऐसे में हमने गांव से चले जाना ही सही समझा."
एक ओर जहां एफ़आईआर में लिखा है कि भुवन और गीता 23 नवंबर 2018 से मुरादाबाद में लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं वहीं भुवन के पिता का कहना है कि गीता और भुवन पिछले डेढ़ साल से साथ रह रहे हैं.
आत्मदाह की कोशिश और पुलिस का बयान
भुवन और गीता मुरादाबाद में साथ रह रहे थे. गीता के तीनों बच्चे विनोद के पास श्यामपुरजट्ट गांव में.
भुवन ने बीबीसी को बताया कि जब गीता ने उसे सारी बातें बताईं तभी दोनों ने न्याय के लिए खड़े होने का फ़ैसला कर लिया था.
वो बताते हैं "हमने कई बार पुलिस से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन पुलिस ने उन्हें अनसुना कर दिया. बीते साल 23 नवंबर 2018 के बाद गीता ने अप्रैल महीने में भी एफ़आईआर दर्ज करने का आग्रह किया था लेकिन पुलिस ने कहा कि जांच के बाद लिखेंगे. इससे वो काफी दुखी हो गई थी."
भुवन का दावा है कि गीता इस क़दर मानसिक रूप से परेशान हो गई थी कि उसने 28 अप्रैल को ख़ुद पर मिट्टी का तेल छिड़कर आत्मदाह की कोशिश की.